बॉम्बे हाई कोर्ट ने भायंदर में स्थित 220 एकड़ नमक वाली जमीन पर केंद्र सरकार का दावा खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि 1870 के ग्रांट के तहत यह जमीन निजी पक्ष की है। यह विवाद ब्रिटिश काल से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने दावा किया था कि ऐतिहासिक रूप से राज्य द्वारा प्रबंधित संपत्तियां वापस सरकारी नियंत्रण में आ जानी चाहिए।

केंद्र की अपील में 1870 के ग्रांट की वैधता को चुनौती दी गई थी। सरकार का तर्क था कि कई दशकों तक नमक उत्पादन की गतिविधियां चलने के कारण यह जमीन सार्वजनिक संपत्ति बन चुकी है।

क्या है मामला?

केंद्र सरकार ने 2019 में हाई कोर्ट का रुख किया था। इससे पहले ठाणे के एक सिविल जज ने 2018 में केंद्र का दावा खारिज कर दिया था। केंद्र ने ठाणे जिले के मीरा-भायंदर क्षेत्र में स्थित मानेक/शापुर सॉल्ट वर्क्स की लगभग 220 एकड़ जमीन पर अपना मालिकाना हक घोषित करने की मांग की थी।

सरकार ने चाहती थी कि द एस्टेट इन्वेस्टमेंट कंपनी प्राइवेट लिमिटेड और मीरा सॉल्ट वर्क कंपनी का इन जमीनों पर कोई अधिकार या मालिकाना हक न हो।

1935 के भारत सरकार अधिनियम पर कोर्ट की टिप्पणी

हाई कोर्ट केंद्र के उस दावे से प्रभावित नहीं हुआ जिसमें 1935 के भारत सरकार अधिनियम का हवाला दिया गया था। अदालत ने कहा कि विवादित जमीनों का उल्लेख इस अधिनियम की अनुसूची में नहीं है।

जस्टिस अंखड द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि केंद्र 1935 के अधिनियम के आधार पर मालिकाना हक का दावा नहीं कर सकता। यह अनुदान तब दिया गया था जब जमीन कृषि योग्य थी। बाद में नमक बनाने के लिए दिया गया लाइसेंस, जमीन के मालिकाना हक को केंद्र को हस्तांतरित नहीं कर सकता।

महाराष्ट्र सरकार का पक्ष

कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र का दावा पहली बार 1983 में नमक लाइसेंस के नवीनीकरण के संदर्भ में सामने आया था। इसके पहले 113 वर्षों या कम से कम 1938 के बाद से तक इस बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया था।

हाई कोर्ट ने साफ किया कि महाराष्ट्र सरकार का भी इन ज़मीनों पर कोई अधिकार या मालिकाना हक नहीं है। उसके दावों को विभिन्न अदालतों, जिनमें सुप्रीम कोर्ट भी शामिल है, पहले ही खारिज कर चुकी है।

हाई कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ठाणे की सिविल ट्रायल कोर्ट ने सही फैसला दिया था। केंद्र सरकार 220 एकड़ ज़मीन पर अपना मालिकाना हक साबित करने में नाकाम रही है और इसलिए वह इस संपत्ति पर कब्जे का दावा करने की हकदार नहीं है।

सरकार की दलील पर कोर्ट ने क्या कहा?

केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने 1921 के बॉम्बे लैंड रेवेन्यू कोड (BLRC) के प्रावधान का हवाला दिया। इस प्रावधान के तहत निजी जमीन पर कब्जा करने वाले व्यक्ति को नमक कलेक्टर की लिखित अनुमति के बिना नमक नहीं बनाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने निजी पक्षों की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों गिरीश गोडबोले, सौरभ कृपाल और एस्पी चिनॉय की दलीलें सुनने के बाद BLRC के नियम 76 पर केंद्र के दलील को गलत करार दिया।

वरिष्ठ वकील सौरभ कृपाल ने तर्क दिया कि जमीन के किसी हिस्से का सिर्फ नमक बनाने के लिए इस्तेमाल करने से मालिकाना हक खत्म नहीं होता या उसमें कोई बदलाव नहीं आता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह नियम जमीन के मालिकाना पहलुओं से नहीं, बल्कि उसके नियामक पहलुओं से संबंधित है।

1870 के अनुदान की वैधता

हाई कोर्ट ने 1870 के कानूनी दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि इसकी व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए कि इससे ब्रिटिश सरकार के राजस्व और मालिकाना हित समाप्त हो गए और इसके बदले जमीन पाने वाले को ऐसी संपत्ति मिली जो विरासत में मिल सकती है, हस्तांतरित की जा सकती है और किसी अन्य को सौंपी जा सकती है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नमक विभाग द्वारा जारी लाइसेंस के तहत जमीन का नमक उत्पादन के लिए इस्तेमाल और बाद में निजी कंपनी द्वारा इसे रखना, कानूनी तौर पर उस संपत्ति को सरकारी मालिकाना हक में नहीं बदलता।

Source link

Picture Source :